जब उज्जैन स्टेशन पर ट्रेन खुलती है तो सबसे पहले दो चीजें नाक में पहुंचती हैं: घी से बने लड्डू की मीठी खुशबू और चंदन की ठंडी सुगंध. अधिकतर लोग इस नगर को केवल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग और कुंभ मेले के नाम से जानते हैं, लेकिन उज्जैन की असली पहचान इन दो धार्मिक आयोजनों से कहीं आगे है.
यह दुनिया के उन चुनिंदा प्राचीन नगरों में से एक है जो हजारों साल से लगातार बसा हुआ है. आप बाजार जाने के लिए किसी छोटी सी गली से गुजर रहे हों, तो अचानक 2 हजार साल पुराने बौद्ध स्तूप के खंडहर दिख जाते हैं, जिनके पास कोई बड़ा साइनबोर्ड नहीं लगा होता. वहां के स्थानीय लोग हर रोज इन खंडहरों के पास से गुजरते हैं, चाय पीते हैं, बच्चे इधर खेलते हैं – इतिहास उनके लिए किसी म्यूजियम के शीशे के पीछे बंद कोई प्रदर्शनी वस्तु नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है.
सदियों पहले जब ग्रीनविच को भौगोलिक मध्य रेखा के रूप में स्वीकार नहीं किया गया था, उज्जैन को ही पृथ्वी का प्रथम अक्षांश बिंदु माना जाता था. नगर के अंदर स्थित जंतर मंतर आज भी खड़ा है, जहां प्राचीन ज्योतिषी सूर्य और चंद्र की स्थिति को देखकर सालों पहले से ही ग्रहण के सही समय की भविष्यवाणी करते थे. आज भी वहां के पंडित मुहूर्त निकालने के लिए उन्हीं हजारों साल पुरानी गणना विधियों का उपयोग करते हैं, जिनकी सटीकता आज के आधुनिक सॉफ्टवेयर से भी कम नहीं है.
बहुत लोग गलत समझते हैं कि उज्जैन केवल तीर्थयात्रियों के लिए है. लेकिन आप अगर धार्मिक नहीं भी हैं, तो भी यह नगर आपको बांध लेता है. सिप्रा नदी के घाटों पर सुबह का समय बेहद खूबसूरत होता है: बुजुर्ग सूर्य नमस्कार करते हैं, छोटे बच्चे पत्थर फेंककर पानी में छलांग लगाते हैं, और नदी के किनारे बैठे वेंडर ऐसा पोहा बेचते हैं जिसमें अतिरिक्त सेव, नींबू और हरी मिर्च का चटना मिलता है – जो सिर्फ उज्जैन में ही मिलता है. गलियों में 3-4 पीढ़ी से चल रही दुकानें हैं जहां हाथ से बने लकड़ी के खिलौने और महेश्वरी साड़ियां मिलती हैं, जिनकी कारीगरी आज भी बरकरार है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन सिप्रा में लाखों दीये जलाए जाते हैं, वह नजारा किसी भी इंसान को दीवाना बना देता है चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से हो.
उज्जैन में प्राचीनता और आधुनिकता बिना किसी टकराव के साथ रहती है. विश्वविद्यालय के आसपास कैफे हैं जहां छात्र कवि सम्मेलन करते हैं, गीत सुनाते हैं और समाज के मुद्दों पर चर्चा करते हैं. वहां की गलियों में पुराने मंदिरों के साथ नए दुकानें, कोचिंग सेंटर और स्टूडियो भी खुले हुए हैं.
जब आप उज्जैन से वापस आते हैं, तो आपके साथ सिर्फ प्रसाद और तस्वीरें नहीं आती हैं. बल्कि एक ऐसी सुस्त, निडर ऊर्जा भी आती है जो सिखाती है कि समय के साथ बदलना जरूरी है, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहना भी. उज्जैन वह नगर है जो हर यात्री को अपने साथ कुछ न कुछ छोड़ जाता है.
उज्जैन: वह नगर जहां हर गली में इतिहास सांस लेता है
Source: HotArticle
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