खेती का काम मौसम और समय से जुड़ा है। बुआई के पहले बीज-खाद चाहिए, बीच में पानी और दवाई, और कटाई के बाद भी कई खर्चे होते हैं। इन सबके लिए पैसा ठीक वक्त पर चाहिए। बाजार से महंगा कर्ज लेना किसान की कमाई को कम कर देता है। इसी सोच के साथ किसान क्रेडिट कार्ड योजना बनाई गई, जिससे बैंकों के जरिए सस्ती और सुचारु ऋण व्यवस्था मिले।
1998 में इसे शुरू किया गया था। तब से यह देश के सबसे बड़े कृषि वित्तीय कार्यक्रमों में गिना जाता है। फिर भी गांवों में आज भी कई किसानों को इसकी बारीकियां पता नहीं होतीं।
किसान क्रेडिट कार्ड क्या है?
सरल शब्दों में, यह एक बैंकिंग सुविधा है जहां किसान को एक निश्चित ऋण सीमा मिलती है। इसे 'चलित ऋण' (revolving credit) कहते हैं, क्योंकि एक बार वापसी करने पर वही राशि फिर से निकाली जा सकती है। कार्ड धारक फसल उत्पादन, बागवानी, पशुपालन, मुर्गीपालन और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों के लिए पैसा ले सकता है।
ज्यादातर बैंक इसे रुपे या मास्टरकार्ड डेबिट कार्ड की तरह जारी करते हैं। एटीएम से नकद निकासी और खरीदारी पर भुगतान दोनों होते हैं। कई जगहों पर किसान इसी कार्ड से सरकारी सब्सिडी और फसल बीमा का लाभ भी जोड़ लेते हैं।
कौन आवेदन कर सकता है?
पात्रता का दायरा काफी व्यापक है। अपनी जमीन वाले किसान सीधे आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा किराए पर खेती करने वाले किसान (जिनके पास वैध लीज एग्रीमेंट हो), संयुक्त देयता समूह (JLG) के सदस्य, महिला किसान और स्वय़ सहायता समूह की सदस्याएं, तथा पशुपालक और मछुआरे जो कृषि संबद्ध काम करते हैं—वे सभी इसके हकदार हैं।
बैंक की शाखा चाहे वाणिज्यिक बैंक हो, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB) हो या सहकारी बैंक—हर जगह यह सुविधा उपलब्ध है। गांव के किसान के लिए सबसे पास वाली शाखा से संपर्क करना सबसे आसान रास्ता है।
ऋण सीमा कैसे तय होती है?
यहाँ 'स्केल ऑफ फाइनेंस' मुख्य आधार है। मान लीजिए किसी किसान के पास एक एकड़ सिंचित जमीन है और वह आलू की खेती करता है। बैंक उस फसल की बुआई, खाद, दवा, श्रम और सिंचाई का अनुमानित खर्च जोड़ता है। इसमें परिवार की छोटी जरूरतें भी जोड़ी जा सकती हैं। कुल राशि ही उसकी वार्षिक सीमा बन जाती है।
अगर कोई किसान डेयरी भी चलाता है, तो उसके लिए अलग से पशु प्रति लागत के हिसाब से सीमा मिलती है। ध्यान रहे कि यह सीमा जमीन के रकबे और फसल के प्रकार पर निर्भर करती है—इसलिए दो किसानों की सीमा एक जैसी नहीं होगी।
ब्याज और सब्सिडी
किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज दर सामान्य कृषि ऋण से कम रखी जाती है। समय पर भुगतान करने वालों को सरकार की ओर से ब्याज अनुदान मिलता है, जिससे वास्तविक बोझ और कम पड़ता है। लेकिन यह छूट तभी मिलती है जब किसान निर्धारित अवधि (आमतौर पर फसल आने के बाद) में कर्ज चुका दे।
देरी से भुगतान पर अतिरिक्त ब्याज लगता है और अनुदान खत्म हो जाता है। इसलिए किसान को अपनी फसल बिक्री के समय का अनुमान लगाकर कर्ज चुकाने की योजना बनानी चाहिए।
आवेदन प्रक्रिया
बैंक शाखा जाने पर वहां 'केसीसी आवेदन पत्र' मिलता है। इसमें मुख्य रूप से ये दस्तावेज लगते हैं: भूमि का खसरा/खतौनी या रिकॉर्ड ऑफ राइट्स, आधार कार्ड और पैन कार्ड, बैंक खाता पासबुक, पासपोर्ट साइज फोटो, और किराएदार के लिए लीज एग्रीमेंट। कई बैंकों ने मोबाइल ऐप और वेबसाइट से आवेदन की सुविधा भी दी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में शाखा में जाकर फॉर्म भरवाना ज्यादा सुरक्षित होता है। वहां बैंक का कृषि अधिकारी खुद ही खेत की जांच (field visit) कर सकता है और सीमा तय करने में मदद करता है।
कार्ड मिलने के बाद
सबसे बड़ी जिम्मेदारी इसे सही इस्तेमाल करने की है। कार्ड से मिली राशि का उपयोग खेती या उससे जुड़े कामों में ही करें। शादी, तीर्थयात्रा या घर का अन्य गैर-कृषि खर्च इसमें नहीं चलता—बैंक इसे नियमों का उल्लंघन मानता है। हर वित्तीय वर्ष के अंत में कार्ड का नवीनीकरण होता है। अगर खाता में कोई गड़बड़ी या बकाया रहता है, तो नवीनीकरण रुक सकता है। इसलिए बीच-बीच में बैंक स्टेटमेंट देखते रहना चाहिए।
फसल बीमा का लाभ
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी सुविधाओं को केसीसी से जोड़ा जा सकता है। अगर सूखा, बाढ़ या ओलावृष्टि से फसल बर्बाद होती है, तो बीमा की राशि सीधे कर्ज की वापसी में समायोजित हो सकती है। यह व्यवस्था किसान को अचानक हुए नुकसान के बाद भी ऋण भार से बचाती है।
आम गलतफहमियां
कई किसान सोचते हैं कि कार्ड मिलने पर वे कोई भी राशि निकाल सकते हैं—यह गलत है। सीमा तय होने के बाद उससे अधिक निकासी नहीं होती। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि केसीसी पर कोई ब्याज नहीं लगता—जबकि सब्सिडी के बावजूद कुछ दर तो बनी रहती है। सही जानकारी न होने से किसान कर्ज के चक्कर में फंस सकता है।
सीमाएं और विकल्प
किसान क्रेडिट कार्ड सभी समस्याओं का हल नहीं है। ट्रैक्टर, ड्रिप इरिगेशन या गोदाम निर्माण जैसे बड़े निवेश के लिए अलग टर्म लोन लेना पड़ता है। केसीसी मुख्य रूप से चल खर्च (working capital) के लिए है। कभी-कभी बैंक की ओर से अनावश्यक देरी या अधिक दस्तावेज मांगे जाने की शिकायत मिलती है। ऐसे में जिला कृषि अधिकारी या बैंकिंग लोकपाल से मदद ली जा सकती है। किसान को अपना आवेदन पर्ची (acknowledgement) संभाल कर रखना चाहिए।
बैंक कभी-कभी सीमा कम कर देता है अगर पिछले साल का उपयोग न के बराबर रहा हो। इसलिए कार्ड को सक्रिय रखना और थोड़ी-बहुत लेन-देन करते रहना फायदेमंद होता है।
डिजिटलीकरण का असर
पिछले कुछ वर्षों में बैंकों ने केसीसी को डिजिटल भुगतान से जोड़ा है। किसान अब एटीएम, पीओएस मशीन और यहां तक कि ऑनलाइन बीज-खाद की दुकानों पर भुगतान कर सकते हैं। इससे नकदी लेकर घूमने का जोखिम कम हुआ है। फिर भी गांवों में नेटवर्क की समस्या हो सकती है, इसलिए पारंपरिक नकद निकासी का विकल्प भी बना हुआ है।
उचित रणनीति
जो किसान पहली बार कार्ड ले रहे हैं, उन्हें एक सलाह दी जा सकती है—अपनी जरूरत से ज्यादा सीमा न मांगें। जितनी राशि वापस करना मुश्किल होगा, उतना ही ब्याज का बोझ बढ़ेगा। बेहतर यही है कि पहले साल छोटी सीमा से शुरुआत करें और समय पर भुगतान करके बैंक का भरोसा जीतें। बाद में सीमा बढ़वाना आसान हो जाता है।
सरकार समय-समय पर विभिन्न कृषि योजनाओं के लाभार्थियों को भी किसान क्रेडिट कार्ड से जोड़ने की अपील करती है ताकि अधिक से अधिक किसान बैंकिंग व्यवस्था में आएं और उन्हें साहूकारों के चंगुल से छुटकारा मिले।
किसान क्रेडिट कार्ड एक ऐसा उपकरण है जो सही इस्तेमाल में आने पर खेती को लाभप्रद बना सकता है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि किसान इसके नियमों को समझे और बैंक से नियमित संवाद बनाए रखे।
किसान क्रेडिट कार्ड: लाभ, पात्रता और आवेदन की पूरी जानकारी
Source: HotArticle
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