1889 की बात है, पेरिस में विश्व मेला लगा हुआ था। सीन नदी के किनारे एक विशालकाय लोहे की मीनार खड़ी थी, जिसे देखकर लोग हैरान थे। कुछ लोग इसे इंजीनियरिंग का चमत्कार मान रहे थे, लेकिन बहुत से पेरिसवासियों के लिए यह आंखों की किरकिरी बन गई थी। उन्हें यह एक भद्दा, बेढंगा ढांचा लगता था जो उनके खूबसूरत शहर की शान को नष्ट कर रहा था।
दरअसल, गुस्ताव एफ़िल ने यह टावर 1889 के विश्व मेले के लिए बनाया था, जो फ्रांसीसी क्रांति की शताब्दी का जश्न मना रहा था। उनका उद्देश्य एक अस्थायी प्रदर्शनी बनाना था जो फ्रांस की औद्योगिक ताकत और आधुनिक इंजीनियरिंग को दिखाए। लेकिन निर्माण शुरू होने के साथ ही विरोध भी शुरू हो गया। मशहूर लेखकों और कलाकारों ने एक याचिका पर हस्ताक्षर किए, जिसमें इसे “बेकार और विकृत” लोहे का ढांचा कहा गया। लेखक गी द मोपासां अक्सर टावर के रेस्तरां में ही खाना खाते थे, क्योंकि उनका कहना था कि “यही एक जगह है जहां से मुझे यह भद्दी चीज नहीं दिखती।” विरोध इतना तीव्र था कि कई लोग चाहते थे कि मेले के बाद इसे गिरा दिया जाए।
मगर एफ़िल टावर बच गया। इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण था—रेडियो तरंगों का प्रसारण। 20वीं सदी की शुरुआत में, इसकी ऊंचाई ने इसे रेडियो एंटीना के लिए अत्यंत उपयोगी बना दिया, खासकर सैन्य संचार के लिए। इसी तकनीकी उपयोगिता ने इसे विध्वंस से बचा लिया। धीरे-धीरे, इसने कलाकारों, कवियों और फोटोग्राफरों की कल्पना को भी आकर्षित किया। कभी जिसे शहर का कलंक समझा जाता था, वह पेरिस का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया।
आज, यह सालाना 70 लाख से ज्यादा पर्यटकों के लिए एक तीर्थ स्थल है। इसके बिना पेरिस की कल्पना ही नहीं की जा सकती। एफ़िल टावर की कहानी हमें याद दिलाती है कि समय और उपयोगिता किसी भी चीज़ की धारणा बदल सकते हैं, और जो चीज़ कभी नफरत का कारण होती है, वह प्रेम और गर्व का प्रतीक बन सकती है।
जब पेरिस ने एफ़िल टावर को ठुकरा दिया था
Source: HotArticle
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