दिल्ली हो या जयपुर, 'जंतर मंतर' का नाम सुनते ही मन में एक अजब-सी उत्सुकता पैदा होती है। पत्थर से बनी ये विशाल आकृतियाँ आज भी खड़ी हैं और उनकी ओर देखकर लगता है जैसे समय ने अपनी गति थाम ली हो। आम लोगों के लिए ये सिर्फ पर्यटक आकर्षण हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये महज़ पत्थर के खंभे नहीं, बल्कि अत्याधुनिक खगोलीय उपकरण हैं? जिस समय दुनिया के कई हिस्सों में दूरबीन का आविष्कार ही हुआ था, उसी दौर में भारत ने इन विशाल संरचनाओं की मदद से सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति का अद्भुत सटीकता से अध्ययन किया।
'जंतर मंतर' शब्द संस्कृत के 'यंत्र' और 'मंत्र' से बना है। यहाँ 'यंत्र' का अर्थ है उपकरण या मशीन, जबकि 'मंत्र' का अर्थ गणना या गणित से जोड़ा जाता है। यानी यह वह जगह है जहाँ गणना करने वाले उपकरण रखे गए हों। इन्हें देखकर यह समझना मुश्किल नहीं है कि हमारे पूर्वजों के पास गणना की कितनी उन्नत पद्धति थी।
**महाराजा जय सिंह द्वितीय की अद्भुत सोच**
जंतर मंतर का इतिहास जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय से जुड़ा है। वे केवल एक शासक ही नहीं, बल्कि एक महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री भी थे। अठारहवीं सदी के आरंभ में उन्होंने महसूस किया कि उस समय उपलब्ध धातु के छोटे खगोलीय उपकरण सटीक माप देने में असमर्थ हैं। इन उपकरणों का आकार जितना छोटा होता है, उनमें त्रुटि की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। इस समस्या को हल करने के लिए उन्होंने पत्थर के विशाल यंत्र बनाने का निर्णय लिया। जैसे-जैसे यंत्र का आकार बढ़ता है, वैसे-वैसे उसकी माप में सटीकता भी बढ़ती जाती है।
जय सिंह ने अपने जीवनकाल में पाँच प्रमुख वेधशालाएँ स्थापित कीं। इनमें से दिल्ली और जयपुर की वेधशालाएँ आज भी सबसे प्रसिद्ध हैं। बाकी तीन उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में बनाई गई थीं। यह कहना गलत नहीं होगा कि उस दौर में खगोल विज्ञान के क्षेत्र में यह भारत की सबसे बड़ी वैज्ञानिक परियोजनाओं में से एक थी।
**दिल्ली का जंतर मंतर: शहर के बीचों-बीच एक कूट रहस्य**
दिल्ली का जंतर मंतर कनॉट प्लेस से कुछ ही दूरी पर स्थित है। बीच शहर में यह विशाल पत्थर की आकृतियों से भरा परिसर पहली नजर में भ्रमित कर सकता है। लेकिन जब आप इनके पीछे के विज्ञान को समझने लगते हैं, तो यही आकृतियाँ आपको चकित करने लगती हैं। इसे मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के दरबार में जय सिंह के काम के दौरान बनवाया गया था। दिल्ली की वेधशाला को उन्होंने अपनी अन्य वेधशालाओं में सबसे बाद में संरक्षित रखने का विशेष ध्यान रखा, हालाँकि मथुरा की वेधशाला समय के साथ नष्ट हो गई और अब केवल उसके उल्लेख ही इतिहास की किताबों में मिलते हैं।
दिल्ली के जंतर मंतर में सबसे आकर्षक संरचना 'सम्राट यंत्र' है। यह एक विशाल त्रिभुजाकार दीवार है जो 39 मीटर ऊँची है। इसकी ढलान इस तरह से बनाई गई थी कि यह पृथ्वी की धुरी के साथ संरेखित हो जाती है। सूरज की किरणें जब इस पर पड़ती हैं तो छाया की मदद से सटीक समय का पता चलता है। आज के डिजिटल युग में अगर आप बिना घड़ी के समय जानना चाहें तो यह यंत्र अब भी काम करता है। इसके अलावा यहाँ जय प्रकाश यंत्र, मिस्र यंत्र और राम यंत्र भी हैं, जिनकी मदद से ग्रहों की स्थिति और तारों के निर्देशांक का अध्ययन किया जाता था।
**जयपुर का जंतर मंतर: विश्व धरोहर की पहचान**
जयपुर स्थित जंतर मंतर न केवल भारत बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे अच्छी संरक्षित पत्थर की वेधशाला है। साल 2010 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया। यह वेधशाला शहर केराजमहल और जंतर मंतर के बीच स्थित है, जो इसे पर्यटकों के लिए आसानी से सुलभ बनाता है। जयपुर की वेधशाला में बीस से अधिक यंत्र मौजूद हैं, जिनमें से प्रत्येक का अलग-अलग उद्देश्य था।
जयपुर के जंतर मंतर का सम्राट यंत्र भारत में अपनी तरह का सबसे बड़ा यंत्र है। इसकी अद्भुत बात यह है कि यह अभी भी इतना सटीक है कि इससे दो सेकंड तक की सटीकता के साथ समय का पता लगाया जा सकता है। यानी हमारे पूर्वजों ने ऐसा यंत्र बनाया था, जो तब के हिसाब से सबसे सटीक घड़ी का काम करता था।
यहाँ का एक और रोचक यंत्र है 'नाडीवालय यंत्र'। इसे 'घड़ी का यंत्र' भी कहा जाता है। इस यंत्र की खासियत यह है कि इसे केवल दो वृत्तों की मदद से समय और पंचांग की जानकारी देने के लिए बनाया गया था। इसकी मदद से सूर्य की स्थिति के आधार पर पूरे दिन का समय आसानी से पढ़ा जा सकता था।
इसके अलावा वहाँ 'दक्षिणा यंत्र' भी है, जिसका उपयोग आकाशीय पिंडों की ऊँचाई मापने के लिए होता था। ये सभी यंत्र इस बात का प्रमाण हैं कि उस समय भारत में विज्ञान और अंतरिक्ष अध्ययन का स्तर कितना ऊँचा था। यह कोई मंदिर नहीं है न ही कोई धार्मिक स्थल; यह पूरी तरह से एक विज्ञान प्रयोगशाला थी, जहाँ आम जीवन से जुड़े समय, पंचांग और मौसम जैसे विषयों पर काम होता था।
**इन यंत्रों से कैसे होता था अध्ययन?**
आधुनिक टेलिस्कोप और उपग्रहों की तुलना में ये पत्थर के यंत्र भले ही अजीब लगें, लेकिन इनका वैज्ञानिक आधार उतना ही मजबूत है। जंतर मंतर के यंत्र मुख्यतः दो सिद्धांतों पर काम करते हैं- छाया का सिद्धांत और कोणीय माप का सिद्धांत। सूर्य की रोशनी से बनने वाली छाया से समय का अनुमान लगाया जाता था। ग्रहों और तारों की स्थिति का पता लगाने के लिए विशेष आकृतियों के बीच से अवलोकन होता था।
'जय प्रकाश यंत्र' इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है। यह एक गोलाकार अवतल संरचना है, जिसके अंदर बनी सीढ़ियाँ और निशान तारों के स्थान को दर्शाते हैं। एक खगोलशास्त्री इसके अंदर खड़े होकर आकाश में किसी भी तारे की स्थिति का पता लगा सकता था। इसे पत्थर का ग्लोब भी कह सकते हैं, लेकिन उल्टा- इसकी सतह अंदर की ओर बनी है ताकि आसमान का नक्शा बिना किसी रुकावट के देखा जा सके।
'राम यंत्र' नाम के यंत्र का उपयोग किसी ग्रह या तारे की दिशा और ऊँचाई का पता लगाने के लिए होता था। यह खुली हवा में बनी गोलाकार दीवारों की एक जोड़ी है, जो काफी गहरी ध्वनि प्रतिध्वनि भी पैदा करती है। कहा जाता है कि इसकी प्रतिध्वनि वहाँ खड़े किसी व्यक्ति को अपनी ही आवाज दोबारा सुनाती है, जो पर्यटकों के लिए एक मजेदार अनुभव है।
**जंतर मंतर का महत्व और आज की प्रासंगिकता**
आज के समय में जंतर मंतर के इन यंत्रों का उपयोग तो खगोलीय अध्ययन के लिए नहीं होता, लेकिन उनकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। खगोल विज्ञान के इतिहासकार इन यंत्रों से जुड़े अभिलेखों का अध्ययन करके यह जानने की कोशिश करते हैं कि उस दौर की खगोलीय गणनाएँ कितनी सटीक थीं। ये वेधशालाएँ आधुनिक विज्ञान के विकास में भारतीयों के योगदान को दर्शाती हैं।
आर्किटेक्चर के छात्रों के लिए यह जगह किसी खुली किताब से कम नहीं है। पत्थर पर गहराई से बने निशान, सटीक कोण और ज्यामितीय आकृतियाँ आज के इंजीनियरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत हैं। खासकर, 'सम्राट यंत्र' की सटीक गणना बताती है कि बिना किसी डिजिटल टूल के भी एक युग ने विज्ञान को कितना कुछ दिया था।
**दिल्ली और जयपुर का जंतर मंतर घूमने की जानकारी**
अगर आप दिल्ली का जंतर मंतर देखने जा रहे हैं, तो यह कनॉट प्लेस के साथ में जनपथ मार्ग के पास स्थित है। मेट्रो से आने पर पटेल चौक स्टेशन पास में ही पड़ता है। यहाँ सुबह की धूप में अपनी छाया के साथ खेलते यंत्रों को देखना सबसे अच्छा अनुभव होता है। दोपहर की चिलचिलाती धूप में पत्थर की सतह गर्म हो जाती है, इसलिए सुबह जल्दी या शाम के समय जाना उचित रहता है। इसका खुलने का समय सूर्योदय से सूर्यास्त तक होता है। दिल्ली में इसे आमतौर पर सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक देखा जा सकता है, और यहाँ प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है। बाहर से ही इसके आगे बना खुला मैदान भी शाम की सैर के लिए अच्छा स्थान है।
जयपुर के जंतर मंतर की बात करें, तो यह दिल्ली के मुकाबले कहीं अधिक विस्तृत और प्रभावशाली है। यह बड़ी संख्या में यंत्रों से भरा हुआ है और सिटी पैलेस के साथ होने की वजह से एक ही टिकट पर दोनों जगहों को एक साथ देखा जा सकता है। यहाँ प्रवेश का समय सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक है। विदेशी पर्यटकों के लिए टिकट की दर अलग होती है, जबकि भारतीय पर्यटकों के लिए सीमित शुल्क रखा गया है। यदि आप इतिहास या विज्ञान में रुचि नहीं भी रखते हैं, तो भी यहाँ की स्थापत्य कला और शांत वातावरण आपको प्रभावित करेगा।
कई बार जयपुर में स्थानीय गाइड आपको इन यंत्रों के बारे में कुछ ऐतिहासिक किस्से सुनाते हैं, जिनमें से कुछ वास्तविक तथ्यों पर आधारित होते हैं और कुछ कल्पना पर। बेहतर होगा कि आप पहले से ही इन यंत्रों की जानकारी पढ़ लें या फिर वहाँ उपलब्ध ऑडियो गाइड का उपयोग करें। इससे आपको सटीक जानकारी मिलेगी और आप इन संरचनाओं के वैज्ञानिक महत्व को सही रूप में समझ पाएँगे।
**अंत में**
जंतर मंतर सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं है। यह हमारी वैज्ञानिक विरासत का एक जीवंत प्रतीक है। जब पश्चिमी दुनिया में विज्ञान की क्रांति का आगाज़ हो रहा था, उसी दौर में भारत में भी इस तरह की वेधशालाएँ बन रही थीं। यह हमें याद दिलाता है कि विज्ञान और तर्क का रास्ता हमारे लिए नया नहीं है। अगली बार जब आप इन विशाल पत्थरों के सामने खड़े हों, तो उन्हें सिर्फ स्मारक की नज़र से न देखें। ज़रा ठहरकर सोचें कि कुछ सौ साल पहले एक इंसान ने सिर्फ आसमान को देखकर, गणना और ज्यामिति की मदद से समय और अंतरिक्ष की गहराइयों को नापा था। यही सोच इस जगह की असली सुंदरता है।
जंतर मंतर: इतिहास, यंत्र और घूमने की पूरी जानकारी
Source: HotArticle
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