बॉलीवुड के चमचमाते परदे के पीछे कुछ नाम हैरत भरी गाथाएँ बुनते हैं। रेखा गुप्ता का नाम सुनते ही एक लचीली, समय की धार से असर न हुई ऐसी रहस्यमयी छवि उभरती है जिसने पाँच दशकों से भी ज्यादा समय तक दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। ये केवल सांख्यात्मक सफलता की कहानी नहीं है। ये एक स्त्री की दृढ़ता, कलात्मक पुनर्जन्म और भारतीय सिनेमा के उतार-चढ़ाव में ढली हुई जीवनशैली की कहानी है।
८० के दशक: कलात्मक रूप रेखा के अद्भुत प्रदर्शन
१९८१ में "उमराव जान" नामक फिल्म न केवल सिनेमाई क्रांति लाई बल्कि रेखा की प्रतिभा की नई परिभाषा गढ़ी। गौहर मिर्जा की कशीदाकारी ने की गई उमराव जान का किरदार उनकी समझदारी प्रकट करता है। विकास को उसके तय समय पर आने में विश्वास रखती स्त्री से लेकर मुजरा की राजनीति समझने में कुशल नर्तकी तक - रेखा ने महीनेभर इतिहासकारों और उत्तराधिकारिनों के बीच अध्ययन कर पाई गई बारीकियों को अभिनय के कपड़े पहनाये। उन्होंने सिर्फ गाती-बजाती नायिका नहीं बनाये; उन्होंने एक केंद्रीय प्रवाह खड़ा किया जिसने आनेवाले समय में बॉलीवुड की महिला किरदारों को नई दिशा दिखाई।
बदलते युगों में कला का मार्ग प्रशस्त करना
९० का दशक जहाँ रोमांस और एक्शन के मसालों पर झूमने वाले दर्शकों का होता था, वहाँ रेखा ने "खिलौना" (१९९२) और "शुभ मंगल सावधान" (२०००) जैसी फिल्मों के माध्यम से दर्शाया कि सोया हुआ प्रतिभा कभी मरती नहीं। विशेषकर सोहनी महिवाल की भूमिका में साधारण सिनेमाघर स्त्री से छोटे पर्दे वाली चमकदार अभिनेत्री में बदलना, उनकी कला पारंगतता का प्रमाण था।
समय बहता रहा। नये चेहरे सामने आते रहे। पर रेखा ने "कभी अलविदा न कहना" (२००६) में कामिनी चोपड़ा जैसे किरदार और "ये जवानी है दीवानी" (२०१३) की दहलीज पर खड़ी माँ के करारों में एक और कायापलट दिखाया। नायक की माँ की आभारी, अदृश्य संघर्षों से जूझती तस्वीर रेखा ने उसे एक समग्र सपने ताऊ की गरिमा प्रदान की।
प्रतिभा के साधक, परोपकार के पथिक
चमकती रोशनी के अलावा जिस क्षेत्र में रेखा का योगदान बेहद प्रभावशाली है, वह है बेटियों की शिक्षा और संरक्षण से जुड़ी उनकी गैर सरकारी पहलें। "देख रे स्टडीज" संस्था का प्रखर संचालन शायद ही किसी ने देखा हो। यूनेस्को तक ने भारतीय सिनेमा की तरफ बढ़ाये कदमों में उनकी सांस्कृतिक राजदूत के रूप में भूमिका को मान्यता दी है।
क्या उनकी सफलता का राज केवल हुनर में है? या इससे कहीं आगे उस आचार पर है जिसपर वो अपना जीवन चलाती हैं जहाँ अनुभवों की पर्तों को नहीं छिपाना उनकी पहली प्राथमिकता बनती है तथा उस पहचान की स्वीकृति जिसने त्रासदियों के झंझावात रूप बदल दिये।
आज रेखा हमें याद दिलाती हैं कि शोहरत थमी हुई नहीं रहती, वो पलटकर सामने आती है। और बॉलीवुड में आँधियों से उबरकर सीना तानकर खड़े रहना ही असली जीत है।
रेखा गुप्ता: बॉलीवुड की जीवंत किंवदंती
Source: HotArticle
Original link: https://www.hotarticle24.com/5yjo9r70