महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी किसी स्थायी और गहरी जड़ों वाले नेता का नाम लिया जाता है, तो शरद पवार का चेहरा सबसे पहले उभरता है। वे कोई मौसमी नेता नहीं हैं, जो चुनावी हवा के साथ बदलते रहे हों। उनकी राजनीति उस पुराने बरगद की तरह रही है, जो अपनी शाखाओं से कई पीढ़ियों को साया देता है, लेकिन उसकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि तूफान भी उसे हिला नहीं पाते।
आज जब हम शरद पवार के बारे में बात करते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि उन्हें सिर्फ एक राजनेता के तौर पर देखना उनके कद को कम आंकना होगा। वे एक ऐसे रणनीतिकार हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति के सबसे मुश्किल दौर में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी। उनकी पहचान सिर्फ चुनाव जीतने या सरकार बनाने से नहीं बनी, बल्कि उस सोच से बनी, जिसमें किसान, उद्योग, सहकारिता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे एक साथ चलते थे।
साठ के दशक में जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा, तब देश और खासकर महाराष्ट्र का सामाजिक ताना-बाना कांग्रेस पार्टी के इर्द-गिर्द बुना हुआ था। यह दौर था यशवंतराव चव्हाण जैसे नेताओं का, जिनकी छत्रछाया में कई युवा चेहरे उभर रहे थे। शरद पवार उसी पीढ़ी का हिस्सा थे। लेकिन जहां बाकी लोग धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ते हैं, वहां पवार ने अपनी अलग पहचान बनाई। महज 27 साल की उम्र में विधायक बनने के बाद उन्होंने जो रफ्तार पकड़ी, वह दशकों तक कम नहीं हुई।
कहा जाता है कि हर बड़ा नेता अपने समय की उपज होता है। शरद पवार के साथ यह बात पूरी तरह लागू होती है। अस्सी के दशक का महाराष्ट्र बदलाव की दहलीज पर खड़ा था। सहकारी आंदोलन गांवों में जड़ें जमा रहा था, चीनी मिलें किसानों की ताकत बन रही थीं, और मुंबई से लेकर नागपुर तक एक नया राजनीतिक प्रवाह आकार ले रहा था। पवार ने इसी प्रवाह को पहचाना और खुद को उसका हिस्सा नहीं, बल्कि उसका संचालक बना दिया।
1978 में जब वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, तब उनकी उम्र महज 38 साल थी। यह एक राजनीतिक भूचाल था, क्योंकि कांग्रेस की स्थापित व्यवस्था से बाहर जाकर किसी नेता ने इतनी कम उम्र में इतना बड़ा पद संभाला हो, ऐसा कम ही देखा गया था। लेकिन असली कहानी सिर्फ उम्र की नहीं थी। असली कहानी थी एक ऐसे नेता की, जो गांव की मिट्टी और शहर की अर्थनीति दोनों को एक साथ समझता था। बाद में वे तीन बार और मुख्यमंत्री बने, लेकिन हर बार उनकी शैली बदली हुई नजर आई। कभी प्रगतिशील किसान नेता के रूप में, कभी औद्योगिक विकास के पैरोकार के तौर पर, और कभी सत्ता के केंद्र में बैठे एक व्यावहारिक रणनीतिकार की तरह।
लेकिन शरद पवार का कद सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रीय राजनीति में उन्होंने जिस तरह से खुद को स्थापित किया, वह उनके धैर्य और संतुलन की मिसाल है। दिल्ली में रक्षा मंत्री के रूप में, केंद्रीय कृषि मंत्री के रूप में, और फिर लगातार गठबंधन सरकारों में एक प्रभावशाली घटक के रूप में। वे उस दुर्लभ राजनेता की तरह हैं, जो न तो पूरी तरह वामपंथी खेमे में गिने गए, न पूरी तरह दक्षिणपंथी, न ही सिर्फ क्षेत्रीय। उनकी राजनीति व्यवहारिकता की राजनीति रही है। विचारधारा को उन्होंने कभी सड़क के गड्ढे की तरह नहीं लिया, जिसमें फंसकर रह जाना है, बल्कि उसे मोड़ और रास्तों की तरह इस्तेमाल किया।
1999 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का गठन उनके करियर का सबसे बड़ा दांव था। कांग्रेस छोड़ना आसान नहीं था, खासकर तब जब उसी पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी थी। लेकिन पवार हमेशा से उन नेताओं में रहे हैं, जो स्थितियों को पहले भांप लेते हैं। सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर उन्होंने जो रुख अपनाया, वह सिर्फ एक विरोध नहीं था, बल्कि एक नई राजनीतिक धारा को जन्म देने का इरादा था। एनसीपी महाराष्ट्र की धरती पर उसी तरह उभरी, जैसे कभी शिवसेना या पुरानी कांग्रेस उभरी थीं—जमीनी मुद्दों के साथ, लेकिन एक नई सोच के साथ।
यहीं पर शरद पवार की असली कुशलता दिखती है। राजनीति में जहां ज्यादातर नेता सिर्फ अपने समर्थकों के घेरे में सिमट जाते हैं, पवार ने विरोधियों से रिश्ते इस तरह बनाए कि किसी भी गठबंधन की सरकार में उनकी उपयोगिता बनी रही। बाल ठाकरे से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक, देवेगौड़ा से लेकर मनमोहन सिंह तक—हर नेता के साथ उनका एक अलग तरह का तालमेल रहा। इसे अवसरवाद कहा जाए या परिपक्वता, लेकिन इसने उन्हें दशकों तक भारतीय राजनीति के केंद्र में बनाए रखा।
हालांकि, शरद पवार की आलोचनाएं भी कम नहीं हैं। सहकारी बैंकों के घोटाले, कथित भ्रष्टाचार के आरोप, और परिवारवाद की राजनीति—ये सब उनकी छवि पर दाग की तरह लगे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जनता के एक बड़े हिस्से ने कभी इन आरोपों को उनके खिलाफ स्थायी नाराजगी में नहीं बदला। शायद इसकी वजह यह है कि जमीन पर उनकी पकड़ हमेशा मजबूत रही। जब एक किसान को लगता है कि यह आदमी मेरी भाषा बोलता है, मेरी परेशानी समझता है, तो शहर के अखबारों की सुर्खियां उस भरोसे को कमजोर नहीं कर पातीं।
पिछले कुछ सालों में शरद पवार की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया है। एनसीपी में टूट, भतीजे अजित पवार का अलग रास्ता, और पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर लड़ाई—यह सब किसी शेक्सपियर के नाटक जैसा लगता है। लेकिन इस पूरी उथल-पुथल में भी शरद पवार का व्यक्तित्व झुका नहीं है। 82 साल की उम्र में भी वे उसी ऊर्जा के साथ जनसभाओं को संबोधित करते हैं, हर सवाल का जवाब देते हैं, और विपक्षी एकता के लिए बैठकें करते नजर आते हैं।
यही उनकी सबसे बड़ी खासियत है—खत्म होने से इनकार करना। जब लोग सोचने लगते हैं कि अब शायद उनका दौर बीत गया, तब वे कोई न कोई ऐसी चाल चलते हैं कि फिर से मीडिया का केंद्र बन जाते हैं। चाहे प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात हो या विपक्षी दलों के साथ गुप्त बैठक, उनकी मौजूदगी आज भी राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर देती है।
लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या शरद पवार ने अपने राजनीतिक जीवन में कोई स्थायी विचारधारा छोड़ी? शायद उनका योगदान किसी किताब में लिखे सिद्धांत से नहीं, बल्कि उस व्यवहार में ढूंढा जाना चाहिए, जो किसानों से लेकर कारोबारियों तक को एक मंच पर लाया। महाराष्ट्र में सहकारी चीनी मिलों का जाल, जल संसाधन प्रबंधन, और शिक्षा संस्थानों की स्थापना—यह सब उनके विजन का हिस्सा रहे हैं, जो अक्सर चुनावी नारों से परे जाकर काम करता है।
शरद पवार पर लिखना दरअसल भारतीय लोकतंत्र के उस बदलते चेहरे को समझना है, जो न तो पूरी तरह पारंपरिक है और न ही पूरी तरह आधुनिक। वे एक कड़ी हैं, जो कांग्रेस के वर्चस्व वाले भारत को गठबंधन वाले भारत से जोड़ती है। जिस तरह शतरंज के एक खिलाड़ी को हर मोहरे की चाल का पहले से अंदाजा होता है, ठीक उसी तरह शरद पवार राजनीति की बिसात पर हमेशा कुछ कदम आगे दिखते हैं।
यही वजह है कि आज जब हम उन्हें देखते हैं, तो सिर्फ एक बूढ़े नेता को नहीं देखते। हम उस प्रणाली को देखते हैं, जो उन्होंने अपने चारों ओर बुनी है। एक ऐसा तंत्र, जिसमें जानकारी सबसे बड़ी पूंजी है, संबंध सबसे बड़ी ताकत, और समय को पहचानना सबसे बड़ी कला। शरद पवार ने कभी खुद को किसी एक छवि में बंधने नहीं दिया—वे कभी किसान नेता हैं, कभी कारोबारियों के मसीहा, कभी समाजवादी, तो कभी उदारवादी। इसी लचीलेपन ने उन्हें राजनीति का वह अजेय योद्धा बनाया, जो आज भी मैदान में डटा हुआ है।
शायद भविष्य के इतिहासकार उनके बारे में अलग-अलग राय रखें। कोई उन्हें गठबंधन राजनीति का शिल्पकार कहेगा, तो कोई सत्ता का व्यापारी। लेकिन एक बात पर सब सहमत होंगे—शरद पवार का राजनीतिक सफर सबक से भरा हुआ है। यह सिखाता है कि सत्ता के शिखर पर कैसे बने रहना है, कब झुकना है, कब चुप रहना है, और कब वह एक वाक्य बोलना है, जो पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच ले।
राजनीति को जीवन मानने वाले इस शख्स की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। और जब तक महाराष्ट्र की मिट्टी में गन्ने की मिठास और सत्ता की कड़वाहट दोनों मौजूद हैं, तब तक शरद पवार का नाम गूंजता रहेगा—एक ऐसा नाम, जो सुनते ही दिमाग में न जाने कितनी ही तस्वीरें एक साथ बनने लगती हैं।
शरद पवार: सियासत की उस चट्टान की कहानी, जो हर मौसम में खड़ी रही
Source: HotArticle
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