अक्सर देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति छोटा सा व्यवसाय शुरू करने जा रहा होता है, तो शुरुआत में उसकी आँखों में जुनून होता है। लेकिन कुछ ही पलों में बातों का रुख बदल जाता है। वह सोचने लगता है, "अगर चला नहीं तो? लोग क्या कहेंगे?" यहाँ व्यवसाय की योजना से ज्यादा 'परिणाम' का डर हावी हो जाता है। ऐसा सिर्फ एक उदाहरण है, हममें से ज्यादातर लोग किसी भी नए कदम से पहले अपने दिमाग में परिणाम की स्क्रीन चला लेते हैं, और अक्सर वह स्क्रीन हमें रुकने पर मजबूर कर देती है।
समस्या यह नहीं है कि हम परिणाम के बारे में सोचते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब हम परिणाम को अपनी पहचान मान लेते हैं। अगर परीक्षा में नंबर कम आए, तो हम खुद को 'असफल' टैग कर देते हैं। अगर प्रोजेक्ट प्लान के मुताबिक नहीं चला, तो हम खुद को 'अक्षम' महसूस करते हैं। परिणाम वास्तव में बस एक जवाब होता है जो हमारे किसी कदम के बाद मिलता है। वह हमारे अस्तित्व का फैसला नहीं है।
कई बार सुना है कि विज्ञान में प्रयोग करते समय अगर आपको वही मिले जो आप चाहते थे, तो उसे 'सफलता' कहें, और अगर उल्टा मिले तो उसे 'नया ज्ञान' कहें। दोनों ही स्थितियों में आपने कुछ पाया है। हम अपनी जिंदगी में इसी सोच को लागू करने से घबराते हैं। हम चाहते हैं कि परिणाम सिर्फ हमारे पक्ष में ही आए, वरना हम उसे नुकसान मान बैठते हैं।
समाज का दबाव इस डर को और बढ़ा देता है। बाहर की दुनिया को आपकी मेहनत की कहानी नहीं पता होती, उसे सिर्फ वह अंतिम तस्वीर दिखती है जिसे हम परिणाम कहते हैं। एक लेखक अगर महीनों लिखकर एक किताब लाता है और उसे ज्यादा पढ़ा नहीं जाता, तो लोग कहेंगे किताब 'फ्लॉप' हो गई। लेकिन लेखक खुद जानता है कि उसने कितना सीखा उस प्रक्रिया में। परिणाम सिर्फ बाहरी दुनिया के लिए एक सूचना है, भीतर की दुनिया के लिए वह बदलाव का प्रमाण हो सकता है।
जब हम थोड़ा पीछे हटकर देखते हैं, तो पाते हैं कि परिणाम की चिंता में हम अपना वर्तमान गवां देते हैं। हम इतना सोचते हैं कि आगे क्या होगा कि जो अभी हाथ में है उसे ठीक से नहीं कर पाते। एक छोटी सी बात समझ में आती है—अगर हमने ईमानदारी से कोशिश की, तो परिणाम चाहे जो भी हो, वह हमें कुछ न कुछ बताने आया है। वह हमें रोकने नहीं, बल्कि अगली बार थोड़ा बेहतर तैयारी करने के लिए कहने आया है।
जीवन में सब कुछ हमारे नियंत्रण में नहीं होता, और परिणाम अक्सर उन चीजों में से एक है जो हवा के रुख पर निर्भर करता है। हम बस अपना पाल खोल सकते हैं। जब हम 'परिणाम' को अपनी पहचान नहीं, बल्कि एक पड़ाव मानते हैं, तब हमारे फैसले ज्यादा साफ होते हैं। आपने कोशिश की, उसका कुछ जवाब आया—यही तो जीवन का तरीका है।
हम परिणाम को अपनी पहचान क्यों बना लेते हैं?
Source: HotArticle
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