संसद शब्द का उपयोग किसी देश की विधायिका या विधान निर्माण करने वाली सर्वोच्च संस्था के लिए किया जाता है। यह शब्द संस्कृत के 'सम्' और 'सद्' धातु से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'साथ बैठना' या 'सभा'। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में संसद वह स्थान होती है जहाँ जनप्रतिनिधि मिलकर देश के कानून बनाते हैं और शासन को दिशा देते हैं। विधायिका के रूप में इसकी भूमिका कार्यपालिका और न्यायपालिका से अलग और पूरक होती है।
इतिहास में प्राचीन गणराज्यों और सभाओं में भी निर्णय लेने की सामूहिक प्रक्रियाएँ रही हैं, किंतु आधुनिक संसदीय प्रणाली का विकास मध्ययुगीन ब्रिटेन से जुड़ा हुआ है, जहाँ राजा के साथ प्रतिनिधियों की सभा विकसित हुई। समय के साथ यह मॉडल विश्व के अनेक देशों ने अपनाया और अपनी संवैधानिक आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन किए।
विभिन्न देशों में संसद की संरचना अलग-अलग हो सकती है। कुछ देशों में यह एक सदनीय होती है, अर्थात् केवल एक ही सदन होता है, जबकि अधिकांश बड़े लोकतंत्रों में यह द्विसदनीय होती है, जिसमें दो सदन होते हैं। भारत का उदाहरण लें तो यहाँ संसद द्विसदनीय है और इसमें राष्ट्रपति, लोक सभा तथा राज्य सभा शामिल हैं। लोक सभा को जनता का सदन कहा जाता है क्योंकि इसके सदस्य सीधे आम चुनावों द्वारा चुने जाते हैं। राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और इसके सदस्य राज्य विधानमंडलों द्वारा चुने जाते हैं। इस प्रकार संघीय ढाँचे में दोनों स्तरों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।
संसद के मुख्य कार्यों में कानून निर्माण सबसे महत्वपूर्ण है। किसी भी साधारण विधेयक को कानून बनने के लिए दोनों सदनों की स्वीकृति और राष्ट्रपति की सहमति से गुजरना होता है। धन विधेयक का मामला विशेष होता है, जहाँ लोक सभा की प्राथमिकता होती है और राज्य सभा केवल सिफारिशें कर सकती है। संविधान संशोधन के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। विधेयक के प्रारूपन से लेकर अंतिम पारित होने तक की प्रक्रिया में पठन, चर्चा और समिति परीक्षण शामिल होते हैं।
संसद कार्यपालिका पर नियंत्रण रखने का भी कार्य करती है। सरकार को अपनी नीतियों और क्रियाओं के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होना पड़ता है। प्रश्नकाल के दौरान सांसद मंत्रियों से सवाल पूछते हैं और शासन की कमियों को उजागर करते हैं। शून्यकाल में सदन में बिना पूर्व सूचना के महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए जा सकते हैं। अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से यदि लोक सभा का बहुमत सरकार के विरुद्ध जाता है तो सरकार गिर सकती है। ये उपकरण लोकतांत्रिक जवाबदेही के आधार हैं।
वित्तीय नियंत्रण संसद की एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका है। वार्षिक बजट को संसद में प्रस्तुत किया जाता है और उस पर विस्तार से चर्चा के बाद ही सरकार को धन व्यय का अधिकार मिलता है। विनियोग विधेयक और वित्त विधेयक के पारित होने से राज्य के खजाने का उपयोग वैधानिक रूप पाता है।
संसदीय समितियाँ इस संस्था की कार्यक्षमता का अभिन्न अंग हैं। विभिन्न विषयों जैसे वित्त, रक्षा, सामाजिक न्याय पर गठित समितियाँ विधेयकों और नीतियों का गहन अध्ययन करती हैं। इन समितियों में सभी दलों के सांसद शामिल होते हैं, जिससे बेहतर परीक्षण संभव हो पाता है। संसद के पूर्ण सत्र में ही नहीं, बल्कि इन समितियों के कक्षों में भी लोकतंत्र की मशीनरी चलती है।
संसद का कामकाज निश्चित सत्रों में संचालित होता है। भारत में आम तौर पर बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र आयोजित होते हैं। इन अवधियों में ही महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए जाते हैं और जनमुद्दों पर चर्चा होती है। सदन के नियमों का पालन सभापति या अध्यक्ष सुनिश्चित करते हैं। लोक सभा के अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति की भूमिका बहस को व्यवस्थित रखने और गतिरोध सुलझाने में निर्णायक होती है।
लोकतंत्र में संसद का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का मंच होती है। विभिन्न क्षेत्रों, वर्गों और विचारधाराओं के प्रतिनिधि यहाँ अपनी बात रखते हैं। संसदीय बहसों से समाज के विविध पक्षों पर प्रकाश पड़ता है और नीति निर्माण में संतुलन बनता है। विपक्ष की भूमिका सरकार की गलतियों को सुधारने में सहायक होती है, जिससे निरंकुशता रुकती है।
संसदीय प्रणाली और अध्यक्षीय प्रणाली में अंतर समझना भी आवश्यक है। संसदीय प्रणाली में शासन प्रमुख प्रधानमंत्री होता है जो संसद का सदस्य भी होता है, जबकि अध्यक्षीय प्रणाली में राष्ट्रपति कार्यपालिका का मुखिया होता है और विधायिका से पृथक होता है। भारत में संसदीय प्रणाली अपनाई गई है, जहाँ प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद लोक सभा के बहुमत के समर्थन पर निर्भर करते हैं।
समय-समय पर संसद के सामने चुनौतियाँ भी आती हैं, जैसे सत्रों की कम अवधि, धरना-प्रदर्शन के कारण कामकाज बाधित होना, या विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा न होना। इन समस्याओं के बावजूद संसद लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा बनी हुई है। नागरिकों के लिए यह जानना उपयोगी है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि किस प्रक्रिया से देश के शासन संचालन में सहायक होते हैं।
संसद केवल एक भवन या संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीवंत धड़कन है, जहाँ जनता की आवाज़ नीतियों का रूप लेती है और राष्ट्र निर्माण की यात्रा निरंतर जारी रहती है।
संसद: संरचना, कार्य और लोकतंत्र में महत्व
Source: HotArticle
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