जब पहली बार एक जेट विमान आपके ऊपर से गुज़रता है, तो ध्वनि बाद में आती है। पहले आता है एक झटका—हवा का दबाव जो छाती पर लगता है, फिर वह गरज जो कानों में घुसकर पूरे शरीर को हिला देती है। बच्चे अक्सर कान ढंक लेते हैं। बड़े खड़े रहते हैं, पर उनकी नज़रें उस छोटे से धातु के पंछी को देखती रहती हैं जो बादलों में कहीं गायब हो जाता है।
जेट विमान का आविष्कार सिर्फ तकनीक की जीत नहीं था। यह इंसानी जिद्द का नतीजा था—उस जिद्द ने जो पक्षियों की उड़ान को देखकर सोचा, "हम भी कर सकते हैं, और तेज़।" द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पहले जेट यात्री विमान उड़ान भरने लगे, तो यात्रा का मतलब ही बदल गया। अटलांटिक पार करने में अब हफ्ते नहीं, घंटे लगते थे।
लेकिन इस तेज़ी की कीमत भी है। जेट इंजन की धड़कन में ईंधन की बर्बादी छुपी है—हर घंटे हज़ारों लीटर। आसमान में छोड़े गए धुएं में कार्बन का बोझ है जो नीचे बसने वालों पर ही पड़ता है। हवाई अड्डों के आस-पास रहने वाले जानते हैं कि रात की चुप्पी कटकर आती है, और सुबह की शांति में अचानक एक दहाड़ घुस जाती है।
फिर भी, जेट विमान ने दुनिया को छोटा किया है। एक दिल्ली का मज़दूर दुबई में काम कर सकता है, हफ्ते में एक बार परिवार से मिल सकता है। एक छात्र लंदन पढ़कर शाम को मुंबई की गली में चाय पी सकता है। ये दूरियाँ अब समय की दूरियाँ बन गई हैं, जगह की नहीं।
विमानन उद्योग अब बदल रहा है। इलेक्ट्रिक प्रोपलशन, हाइड्रोजन ईंधन, और अधिक कुशल इंजन डिज़ाइन पर काम चल रहा है। कुछ दशक बाद शायद वही आवाज़ कम तेज़ हो, या फिर कुछ और ही तरह की हो। पर वह जो भाव रह जाता है जब एक जेट ऊपर उठता है और धरती को छोड़ता है—वह शायद नहीं बदलेगा। वह अभी भी वही है जो राइट ब्रदर्स को किट्टी हॉक के रेतीले तट पर खींच ले गया था।
हम अभी भी उड़ना चाहते हैं। बस अब हम जानते हैं कि इसके लिए कितना धुआं चाहिए।
उस आवाज़ में क्या है जो सिर्फ सुनाई नहीं देती, महसूस होती है
Source: HotArticle
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