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काई दिगे बाच: जब ज़िंदगी सिर्फ बचे हुए से चलती है

गाँव की एक फुरसत की दोपहर। बुज़ुर्ग चौपाल पर बैठे हैं। कोई पूछता है — "कितना बचा?" जवाब आता है — "काई दिगे बाच।" मतलब — जो बचा, वही बचा। यह सिर्फ एक जवाब नहीं है। यह एक पूरी ज़िंदग